गीता उपदेश: श्रीकृष्ण ने अर्जुन से क्या कहा

गीता उपदेश, दो पंक्तियों में

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को तीन बातें समझाईं: अपना कर्तव्य पहचानना, उसे फल की चिंता के बिना करना, और डर से पैदा हुए शक को समझ से काटना। आखिर में उन्होंने फ़ैसला अर्जुन पर छोड़ा: पूरी बात पर सोचकर, जैसा वह चाहे वैसा करे। गीता उपदेश असल में एक फ़ैसले की कहानी है।

अर्जुन के सामने क्या था

कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं। अर्जुन रथ को बीच में ले चलने को कहता है और सामने देखता है: पितामह भीष्म, गुरु द्रोण, मामा, भाई, बेटे और दोस्त। उसके तर्क मज़बूत लगते हैं: अपनों को मारकर कैसी जीत, कुल टूटेगा, पाप लगेगा। फिर वह धनुष रख देता है और कृष्ण से वह माँगता है जो आज भी हर उलझा इंसान माँगता है:

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।2.7।।

हमारे शब्दों में: अर्जुन कहता है: कमज़ोरी ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है, और धर्म को लेकर मेरा मन उलझ गया है। इसलिए आपसे पूछ रहा हूँ: जो मेरे लिए सच में अच्छा हो, वह मुझे पक्का बताइए। आपका शिष्य बनकर आपकी शरण में आया हूँ; मुझे राह दिखाइए।

"निश्चितं ब्रूहि", यानी पक्का बताइए। अर्जुन एक ऐसा फ़ैसला माँग रहा था, जिस पर वह टिक सके।

कृष्ण ने सबसे पहले क्या किया

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।

हमारे शब्दों में: कृष्ण कहते हैं: आप उनके लिए शोक कर रहे हैं जिनके लिए शोक की कोई वजह नहीं, और बातें समझदारी की कर रहे हैं। समझदार लोग न उनके लिए शोक करते हैं जो चले गए, न उनके लिए जो अभी हैं।

कृष्ण अर्जुन के तर्कों की जड़ देखते हैं। बातें ज्ञान जैसी हैं, पर उनके पीछे दुख बोल रहा है। हर फ़ैसले में यह पहला सवाल काम आता है: इस वक्त तथ्य बोल रहे हैं, या डर?

फ़ैसला: कर्म पर ध्यान, फल पर नहीं

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

हमारे शब्दों में: आपका हक आपके कर्म पर है; फल पर यह हक कभी नहीं होता। फल को अपने काम की वजह न बनने दीजिए, और काम छोड़ देने की तरफ़ भी मत झुकिए।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।2.48।।

हमारे शब्दों में: मन को योग में टिकाकर और चिपकाव छोड़कर काम कीजिए। काम बने या न बने, दोनों में मन एक-सा रहे। मन की इसी बराबरी को योग कहा गया है।

फ़ैसला साफ़ है: अर्जुन अपने कर्तव्य से पीछे न हटे, और उसे नतीजे के डर या लालच में आकर भी न करे। जो उसके हाथ में है, बस वही करे।

पहला कदम: शक को काटकर उठना

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।3.8।।

हमारे शब्दों में: जो काम आपके हिस्से का है, उसे कीजिए। कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है; बिना कर्म के तो शरीर का रोज़ का गुज़ारा भी नहीं चल सकता।

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।4.42।।

हमारे शब्दों में: इसलिए अधूरी समझ से उपजे और दिल में बैठे इस शक को ज्ञान की तलवार से काट दीजिए। योग में टिकिए, और उठिए।

कृष्ण जो पहला कदम देते हैं, वह बहुत छोटा है: उठिए। अगला कदम उसके बाद आता है।

आखिरी बात: फ़ैसला अर्जुन के हाथ में

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।18.63।।

हमारे शब्दों में: मैंने आपको यह ज्ञान दे दिया है, जो गहरे से गहरे रहस्य से भी गहरा है। अब इस पर पूरी तरह सोचिए, और फिर जैसा आप चाहें, वैसा कीजिए।

लगभग पूरी गीता समझाने के बाद भी कृष्ण हुक्म नहीं देते; वे पूरा सोचने को कहते हैं और चुनाव अर्जुन पर छोड़ते हैं। इसके बाद अर्जुन कहता है कि उसका मोह मिट गया, शक नहीं बचा, और अब वह कृष्ण की बात पर चलेगा (18.73)।

आज के फ़ैसले के लिए इसका मतलब

अपनी दुविधा पर गीता उपदेश के तीन सवाल:

  1. मेरा तर्क तथ्य से आ रहा है, या उस डर से जिसका नाम लेना मुश्किल है?
  2. इस हालत में मेरा अपना कर्तव्य क्या है, और उसमें से आज मेरे हाथ में क्या है?
  3. आज कौन-सी एक बात कहनी है, या कौन-सा एक काम करना है?

KarmaLens की gallery में छपे इस असली कार्ड में दुविधा अर्जुन जैसी है, बस छोटे पैमाने पर: किसी बड़े या senior की बात गलत लगे, तो चुप रहा जाए या आदर के साथ असहमति जताई जाए?

सारथी का फ़ैसला, हिंदी में: ऊँच-नीच बचाने के लिए चुपचाप हाँ में हाँ मिलाने की कीमत सच भी चुकाता है और आपकी अपनी समझ भी। आदर के साथ असहमत होना ज़्यादा कठिन कर्तव्य है।

कार्ड की पंक्ति, हिंदी में: ज़्यादातर महँगे कदम बुरी नीयत से नहीं उठते; वे अच्छे शब्दों में लिपटी जल्दबाज़ी होते हैं।

पूरा कार्ड देखिए
अर्जुन के सामने भी भीष्म और द्रोण थे, जिनका वह दिल से आदर करता था (2.4)। गीता का जवाब तब भी यही था: आदर बना रहे, और कर्तव्य भी न छूटे।

गीता का यही क्रम, आपकी दुविधा पर

और पढ़िए: गीता सार · धर्म क्या है · कर्म क्या है · हिंदी पहला पन्ना

सारथी नाम उसी रथ से आया है। वह आपकी दुविधा पर यही क्रम चलाता है: पहले तथ्य, फिर एक फ़ैसला, फिर पहला कदम, और जहाँ कोई श्लोक सच में बैठे, वहाँ गीता। हिंदी में लिखिए, जवाब भी हिंदी में आएगा।

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