कर्म क्या है? 'कर्म करो, फल की चिंता मत करो' का असली मतलब

कर्म क्या है, दो पंक्तियों में

कर्म का मतलब है हर काम: जो कहा, जो चुना, और जो टाला गया, वह भी। गीता के हिसाब से कर्म से बचना मुमकिन ही नहीं, इसलिए देखने की बात यह है कि कर्म किस भाव से किया जाए।

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।3.5।।

हमारे शब्दों में: कोई भी इंसान एक पल के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति से मिले गुण हर किसी से, चाहे-अनचाहे, कर्म करवा ही लेते हैं।

KarmaLens भी हर फ़ैसले के साथ "कुछ न करने" की कीमत अलग से लिखता है, क्योंकि टालना भी एक कर्म है।

"कर्म करो, फल की चिंता मत करो": गीता असल में क्या कहती है

यह मशहूर बात गीता के इस श्लोक से आती है:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

हमारे शब्दों में: आपका हक आपके कर्म पर है; फल पर यह हक कभी नहीं होता। फल को अपने काम की वजह न बनने दीजिए, और काम छोड़ देने की तरफ़ भी मत झुकिए।

इस एक श्लोक में चार बातें हैं:

  1. आपका हक आपके कर्म पर है।
  2. फल पर यह हक कभी नहीं होता।
  3. फल आपके काम की वजह न बने।
  4. और काम छोड़ देने की तरफ़ भी झुकाव न हो।

ज़्यादातर लोगों को पहली दो बातें याद रहती हैं, और चौथी छूट जाती है। गीता यहाँ पूरा कर्म करने को कहती है, बस नतीजे के डर या लालच के बिना। "चिंता मत करो" का मतलब लापरवाही भी नहीं है। इसका मतलब है योजना बनाना, मेहनत करना, नतीजे के बारे में सोचना भी; बस नतीजे के हाथ में फ़ैसले की लगाम न देना।

कर्मयोग और निष्काम कर्म

कर्मयोग गीता के तीसरे अध्याय का नाम है: कर्म को ही साधना बना लेना। "निष्काम कर्म" शब्द गीता के श्लोकों में सीधे नहीं आता; यह बाद में इसी विचार का नाम बना। गीता खुद इसे "असक्त" होकर कर्म करना कहती है, यानी बिना चिपके (3.19)। और 2.48 में मन की इसी बराबरी को "समत्व" कहा गया है: काम बने या बिगड़े, मन एक-सा रहे।

इसका असली मतलब क्या नहीं है

यह किस्मत की बात नहीं है। लोग अक्सर "कर्म" को किस्मत या "जैसा किया, वैसा भरा" के हिसाब की तरह बोलते हैं। गीता की यह पंक्ति आज के काम की बात करती है: आज आप क्या करें, यह आपके हाथ में है, और ध्यान उसी पर रहे।

यह बैठे रहने की इजाज़त नहीं है। गीता कर्म को कुछ न करने से साफ़ बेहतर कहती है:

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।3.8।।

हमारे शब्दों में: जो काम आपके हिस्से का है, उसे कीजिए। कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है; बिना कर्म के तो शरीर का रोज़ का गुज़ारा भी नहीं चल सकता।

एक सच्चे फ़ैसले में कर्म

KarmaLens की gallery में छपे इस असली कार्ड में 2.47 की बात रोज़ की भाषा में दिखती है। दुविधा थी: career में नाम और शोहरत के पीछे भागा जाए, या हुनर पर ध्यान दिया जाए?

सारथी का फ़ैसला, हिंदी में: शोहरत को career का पैमाना बनाना छोड़िए। पहले हुनर और योगदान बनाइए; पहचान आए तो आए, न आए तो न सही।

कार्ड की पंक्ति, हिंदी में: संयम के बिना साफ़ सोच शोर बन जाती है, और साफ़ सोच के बिना संयम भटकाव।

पूरा कार्ड देखिए
हुनर और योगदान कर्म हैं, जो आपके हाथ में हैं। पहचान फल है, जो आपके हाथ में नहीं। फ़ैसला वहीं टिका है जहाँ आपका हक है।

नतीजे के डर में अटका फ़ैसला आज लिखिए

और पढ़िए: गीता सार · गीता उपदेश · धर्म क्या है · हिंदी पहला पन्ना

जिस फ़ैसले पर नतीजे का डर बैठा है, उसे लिखिए। सारथी पहले वे तथ्य पूछेगा जिन पर बात टिकी है, फिर एक फ़ैसला देगा, और वह पहला कदम जो आज आपके हाथ में है।

मेरी दुविधा परखिए

मुफ़्त, निजी, करीब दो मिनट।